दोस्तों -आत्मकथा में आज मैं उन बातों पर प्रकाश डालना चाहता हूँ --जो हमने अनुभव किये हैं | मेरी सही शिक्षा गुरुकुल में हुई थी जो अधूरी रह गयी थी गरीबी के कारण या ग्रहों के प्रभाव के कारण -यह समय था -1983 से 1988 तक | गुरुकुल में मेरे आराध्य सरकार कहाँ से आये वो कौन थे यह कथा अज्ञात थी | मेरे सरकार परम कर्मनिष्ठ थे ,हमने जो ग्रन्थ पढ़ें हैं या उनके सत्संग से जो हमने अनुभव किये हैं उनके अनुसार मेरे लिए ईस्वर सदृश्य थे | आज जब मैं 54 वर्ष का हो चूका हूँ तो मुझे जो अनुभव जीविनि लिखते समय हो रहा है --वो व्यक्त करना चाहता हूँ | --अस्तु --गुरुकुल में वो बालक पढ़ें जिनके माता पिता नहीं थे या जिनके अंग कुछ नहीं थे या वो अष्टावक्र थे या वो चोर थे या वो संस्कार हीन थे या फिर जिनके माता पिता पालने में असमर्थ थे ---ऐसी स्थिति में मैं -दारिद्र तो था ही मूर्ख परिवार से था | हमने किसी ऐसे परिवार के बच्चों को आते नहीं देखा जो उत्तम हों --पर आश्रम में जो संरक्षक थे वो भी ऐसे ही थे | जिनके द्वारा आश्रम की व्यवस्था चलती थी --वो भी वज्र मूर्ख थे --पर सरकार के प्रभाव से वो संस्कारी थे किन्तु उनकी जीवनी उत्तम नहीं थी -पतनी + बेटियों को छोड़कर सरकार के पास रहते थे निःस्वार्थ --उनका नाम कला था --वास्तव में तत्काल के सभी मूर्ख छात्रों को नया जीवन देने में शाम ,दाम ,भेद की ऐसी कला थी कालानन्द जी में जिनकी बदौलत कई छात्र उच्च पद पर आसीन हुए तो कई छात्र भागवतकार हुए | मेरे हिसाब से सभी उदण्ड छात्रों के द्वारा कई छात्र महान हुए | उस आश्रम में ऐसा लग रहा था मानों चारों ओर धर्मध्वज फहरा रहा था | आश्रम के चारों ओर सरकार की कीर्ति व्याप्त थी --बहुत दूर देश से लोग अपने -अपने असहाय स्थिति के कारण या बच्चों से दुःखी होने के कारण अभिभावक सरकार के पास बच्चों को लेकर आते थे बदले में एक निपुण व्यक्ति बनकर वही छात्र सरकार का धर्मध्वज देश -विदेशों में फहराते थे | आदर्श भारतीय संस्कृति और संस्कारों को बढ़ाते थे | उसमें एक मैं भी ऐसा ही छात्र था -पर आज जहाँ भी हूँ वो केवल उस आश्रम की देन है ,आज जो मुझमें कुछ खूबियां हैं वो सरकार की ही वास्तव में देन हैं | हमारे सरकार उस आश्रम में निर्भय और निर्विकार होकर तप में लगे रहते थे | भारतीय जो सनातन संस्कृति है --उसकी व्यापकता समझना बड़ा ही कठिन है | भारतीय सनातन संस्कृति में --भले ही वो चोर रहा हो ,उदण्ड रहा हो ,संस्कार हीन रहा हो किन्तु --धर्मध्वज पताका का मान बढ़ाने में बहुत बड़ा ह्रदय से योगदान दिया है | मुझे लगता है --विश्व का कोई भी कोना हो --सनातन संस्कृति ह्रदय से सभी को अपना मानती है और बढ़ाती हैं | सनातन संस्कृति पर आंख बंद करके भी भरोसा किया जा सकता है | अतः अपने ज्योतिष और कर्मकाण्ड के पाठक गणों ने निवेदन करता हूँ --किसी सनातनी व्यक्ति से भले ही भूल हो जाय -पर एक न एक दिन अपने आपको वो अवश्य सुधारता है | -आगे की चर्चा अगले भाग में पढ़ें --भवदीय निवेदक खगोलशास्त्री झा मेरठ --जीवनी की तमाम बातों को पढ़ने हेतु इस ब्लॉकपोस्ट पर पधारें ---khagolshastri.blogspot.com
ऑनलाइन ज्योतिष सेवा होने से तत्काल सेवा मिलेगी -ज्योतिषी झा मेरठ
ऑनलाइन ज्योतिष सेवा होने से तत्काल सेवा मिलेगी -ज्योतिषी झा मेरठ 1 -कुण्डली मिलान का शुल्क 2200 सौ रूपये हैं | 2--हमसे बातचीत [परामर्श ] शुल्क है पांच सौ रूपये हैं | 3 -जन्म कुण्डली की जानकारी मौखिक और लिखित लेना चाहते हैं -तो शुल्क एग्ग्यारह सौ रूपये हैं | 4 -सम्पूर्ण जीवन का फलादेश लिखित चाहते हैं तो यह आपके घर तक पंहुचेगा शुल्क 11000 हैं | 5 -विदेशों में रहने वाले व्यक्ति ज्योतिष की किसी भी प्रकार की जानकारी करना चाहेगें तो शुल्क-2200 सौ हैं |, --6--- आजीवन सदसयता शुल्क -एक लाख रूपये | -- नाम -के एल झा ,स्टेट बैंक मेरठ, आई एफ एस सी कोड-SBIN0002321,A/c- -2000 5973259 पर हमें प्राप्त हो सकता है । आप हमें गूगल पे, पे फ़ोन ,भीम पे,पेटीएम पर भी धन भेज सकते हैं - 9897701636 इस नंबर पर |-- ॐ आपका - ज्योतिषी झा मेरठ, झंझारपुर और मुम्बई----ज्योतिष और कर्मकांड की अनन्त बातों को पढ़ने हेतु या सुनने के लिए प्रस्तुत लिंक पर पधारें -https://www.facebook.com/Astrologerjhameerut
सोमवार, 9 दिसंबर 2024
मेरी आत्मकथा पढ़ें भाग -103 - खगोलशास्त्री ज्योतिषी झा मेरठ
दोस्तों -आत्मकथा में आज मैं उन बातों पर प्रकाश डालना चाहता हूँ --जो हमने अनुभव किये हैं | मेरी सही शिक्षा गुरुकुल में हुई थी जो अधूरी रह गयी थी गरीबी के कारण या ग्रहों के प्रभाव के कारण -यह समय था -1983 से 1988 तक | गुरुकुल में मेरे आराध्य सरकार कहाँ से आये वो कौन थे यह कथा अज्ञात थी | मेरे सरकार परम कर्मनिष्ठ थे ,हमने जो ग्रन्थ पढ़ें हैं या उनके सत्संग से जो हमने अनुभव किये हैं उनके अनुसार मेरे लिए ईस्वर सदृश्य थे | आज जब मैं 54 वर्ष का हो चूका हूँ तो मुझे जो अनुभव जीविनि लिखते समय हो रहा है --वो व्यक्त करना चाहता हूँ | --अस्तु --गुरुकुल में वो बालक पढ़ें जिनके माता पिता नहीं थे या जिनके अंग कुछ नहीं थे या वो अष्टावक्र थे या वो चोर थे या वो संस्कार हीन थे या फिर जिनके माता पिता पालने में असमर्थ थे ---ऐसी स्थिति में मैं -दारिद्र तो था ही मूर्ख परिवार से था | हमने किसी ऐसे परिवार के बच्चों को आते नहीं देखा जो उत्तम हों --पर आश्रम में जो संरक्षक थे वो भी ऐसे ही थे | जिनके द्वारा आश्रम की व्यवस्था चलती थी --वो भी वज्र मूर्ख थे --पर सरकार के प्रभाव से वो संस्कारी थे किन्तु उनकी जीवनी उत्तम नहीं थी -पतनी + बेटियों को छोड़कर सरकार के पास रहते थे निःस्वार्थ --उनका नाम कला था --वास्तव में तत्काल के सभी मूर्ख छात्रों को नया जीवन देने में शाम ,दाम ,भेद की ऐसी कला थी कालानन्द जी में जिनकी बदौलत कई छात्र उच्च पद पर आसीन हुए तो कई छात्र भागवतकार हुए | मेरे हिसाब से सभी उदण्ड छात्रों के द्वारा कई छात्र महान हुए | उस आश्रम में ऐसा लग रहा था मानों चारों ओर धर्मध्वज फहरा रहा था | आश्रम के चारों ओर सरकार की कीर्ति व्याप्त थी --बहुत दूर देश से लोग अपने -अपने असहाय स्थिति के कारण या बच्चों से दुःखी होने के कारण अभिभावक सरकार के पास बच्चों को लेकर आते थे बदले में एक निपुण व्यक्ति बनकर वही छात्र सरकार का धर्मध्वज देश -विदेशों में फहराते थे | आदर्श भारतीय संस्कृति और संस्कारों को बढ़ाते थे | उसमें एक मैं भी ऐसा ही छात्र था -पर आज जहाँ भी हूँ वो केवल उस आश्रम की देन है ,आज जो मुझमें कुछ खूबियां हैं वो सरकार की ही वास्तव में देन हैं | हमारे सरकार उस आश्रम में निर्भय और निर्विकार होकर तप में लगे रहते थे | भारतीय जो सनातन संस्कृति है --उसकी व्यापकता समझना बड़ा ही कठिन है | भारतीय सनातन संस्कृति में --भले ही वो चोर रहा हो ,उदण्ड रहा हो ,संस्कार हीन रहा हो किन्तु --धर्मध्वज पताका का मान बढ़ाने में बहुत बड़ा ह्रदय से योगदान दिया है | मुझे लगता है --विश्व का कोई भी कोना हो --सनातन संस्कृति ह्रदय से सभी को अपना मानती है और बढ़ाती हैं | सनातन संस्कृति पर आंख बंद करके भी भरोसा किया जा सकता है | अतः अपने ज्योतिष और कर्मकाण्ड के पाठक गणों ने निवेदन करता हूँ --किसी सनातनी व्यक्ति से भले ही भूल हो जाय -पर एक न एक दिन अपने आपको वो अवश्य सुधारता है | -आगे की चर्चा अगले भाग में पढ़ें --भवदीय निवेदक खगोलशास्त्री झा मेरठ --जीवनी की तमाम बातों को पढ़ने हेतु इस ब्लॉकपोस्ट पर पधारें ---khagolshastri.blogspot.com
आत्मकथा क्यों लिखी या बोली सुनें -ज्योतिषी झा मेरठ
दोस्तों आत्मकथा एक सोपान हैं | प्रथम सोपान एक से तैतीस भाग तक ,दूसरा सोपान तैतीस भाग से बानवें भाग तक और अन्तिम सोपान बानवें भाग से अन्त तक -इसके बारे में कुछ कहना चाहता हूँ सुनें --आपकी राशि पर लिखी हुई बातें मिलती है कि नहीं परखकर देखें -
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