आज मैं अपनी आत्मकथा में शनि की महादशा का प्रभाव पर कुछ कहना चाहता हूँ | --अस्तु -हर व्यक्ति की कुण्डली समस्त बातों को दर्शाती है --मेरी कुण्डली भी जीवन +मृत्यु को दर्शाती है | मेरी जन्मकुण्डली के अनुसार 2014 से शनि की दशा प्रारम्भ हुई जो 2033 तक चलेगी | शनि मेरी कुण्डली में भाग्य के क्षेत्र में नीच है अतः नीचता से मेरा भाग्योदय होगा --यह बात सौ प्रतिशत सही है | मुझे जीवन में बहुत कुछ मिला पर जिस योग्य था या हूँ उस अनुपात में नहीं मिला | पिता की जगह गैर व्यक्ति पिता की तरह स्नेह तो दिया ही पुत्र की तरह उठाया और बढ़ाया भी | मुझे सहोदर मामा ने कुछ नहीं दिया --गैर व्यक्ति मामा बनकर आगे बढ़ाया | अपने जीजा ने कुछ नहीं दिया --गैर जीजा ने आगे बढ़ाया | अपनी माँ की वात्सलयता या छाया नहीं मिली --सास से दोनों चीजें मिली | अपने सहोदर दीदी हो या अनुज इन दोनों ने मान नहीं बढ़ाया बल्कि गैर व्यक्ति कोई भाई का धर्म निभाया तो कोई दीदी का धर्म निभाया | --मेरा व्यक्तिगत स्वभाव रहा अगर किसी को प्रेम नहीं दिया तो दुःख देने का भी प्रयास नहीं किया | हमने सभी सगे -सम्बन्धियों से भले ही रिश्ते नाते नहीं रखे हों पर कुछ न कुछ दिया और दूर होकर जीने का प्रयास किया | मेरे पिता की कुण्डली में भी नीच का शनि संतान क्षेत्र में था --मेरा भाग्य और पिता से सम्बन्ध बहुत ही गड़बड़ रहा | जबकि पिता और मेरा - दोनों के स्वभाव चाहे समाज हो या व्यक्तिगत जीवन उत्तम और संतोषजनक रहा , पिता परोपकारी थे ,बलशाली थे ,कर्मठ थे ,धार्मिक थे ,सदा मस्त रहते थे -जो था बहुत था यही सोच थी --अपने कार्य में लगे रहते थे | ये तमाम गुण मुझमें भी थे पर --पिता अनपढ़ थे तो मैं विद्वान था ,पिता बहुत ही बलवान थे मैं अति निर्बल था | पिता सदा बल से मुझे जीतने का प्रयास करते थे और मैं सदा बुद्धि से समझाने का प्रयास करता था --पर न मैं पिता को समझा पाया न ही पिता मुझे जीत पाये --परिणाम यह हुआ दोनों के रास्ते अलग -अलग गए | पर न तो पिता मेरे बिना जी पाए और न ही पिता के बिना मैं जी पाया | पिता के पास सबकुछ था --केवल मैं नहीं था --और वो ईश्वर के समीप रहने लगे -जब भी मेरी याद आती थी तो मूर्छित हो जाते थे --यह वेदना ऐसी थी -सांसे तो थी चैन नहीं था | ऐसी स्थिति में केवल मुझे अपने समीप चाहते थे --जो संभव नहीं था | मेरे साथ भी ऐसा ही था --सबकुछ था पर पिता नहीं थे तो अपने आप को अधूरा समझता था | ऐसा लगता था मेरी शान ,मेरी पहचान तो पिता से है --जब पिता नहीं तो संसार के तमाम वैभव किस काम के | मेरे पिता चल बसे -2018 में | पिता के जाने के बाद मैं भी मूर्छित हो गया | ऐसा लगा मेरी वजह से पिता चल बसे --धिक्कार है मुझे अब जीवन जीने और विलाप करने का मेरा कोई अधिकार नहीं है | यह बात न तो पतनी से कह सकता था न ही परजनों को -अंत में मैं भी प्रभु की शरण में रहने लगा | जीने की लालसा खत्म हो गयी -फिर न मेरे पास साज रहे न आवाज , कलम में लिखने की ताकत नहीं रही ,पिता के साथ मानों मेरा तेज समाप्त हो गया | जब मेरे साथ ऐसा होने लगा तो मुझे आभास हुआ मेरे पिता के साथ भी ऐसा ही होने लगा होगा --वो भी माँ से या परिजनों से यह बात नहीं कह पाये होंगें | मेरे पिता सबके साथ होते हुए भी अकेलापन महसूस करते थे इसलिए सदा एकान्त में रहते थे | मैं भी सबके साथ रहता हुआ भी सदा अकेला अपने को पाया है | --मुझे कईबार अहसास हुआ मेरे जीवन का अनमोल रतन मेरे पिता थे -जिनके बिना मैं शून्य हूँ - तो मेरे पिता को भी यही अहसास हुआ होगा | --वैसे मैं ज्योतिषी इसलिए बना था -क्योंकि मेरा अनुज सर्प दंश से मरा था --यह बात मुझे इतनी लगी कि अनन्त ग्रन्थों में यही मृत्यु योग को ढूंढने में जीवन निकल गया --जब होश आया तब पता चला कुण्डली में तो बहुत सी बातें होती हैं जिनपर हमारी नजर नहीं पड़ी | अब एक सक्षम ज्योतिषी होने पर मेरा ध्येय यह है --कोई भी व्यक्ति अपनी कुण्डली का सही आकलन करें और उस पथ पर चले --जिससे उसको सही दिशा मिले ,सही प्रकाश मिले --वो भटके नहीं वो अनन्त बाधाओं का सामना -यत्न और प्रयत्न से करें | -आगे की चर्चा अगले भाग में पढ़ें --भवदीय निवेदक खगोलशास्त्री झा मेरठ --जीवनी की तमाम बातों को पढ़ने हेतु इस ब्लॉकपोस्ट पर पधारें ---khagolshastri.blogspot.com
ऑनलाइन ज्योतिष सेवा होने से तत्काल सेवा मिलेगी -ज्योतिषी झा मेरठ
ऑनलाइन ज्योतिष सेवा होने से तत्काल सेवा मिलेगी -ज्योतिषी झा मेरठ 1 -कुण्डली मिलान का शुल्क 2200 सौ रूपये हैं | 2--हमसे बातचीत [परामर्श ] शुल्क है पांच सौ रूपये हैं | 3 -जन्म कुण्डली की जानकारी मौखिक और लिखित लेना चाहते हैं -तो शुल्क एग्ग्यारह सौ रूपये हैं | 4 -सम्पूर्ण जीवन का फलादेश लिखित चाहते हैं तो यह आपके घर तक पंहुचेगा शुल्क 11000 हैं | 5 -विदेशों में रहने वाले व्यक्ति ज्योतिष की किसी भी प्रकार की जानकारी करना चाहेगें तो शुल्क-2200 सौ हैं |, --6--- आजीवन सदसयता शुल्क -एक लाख रूपये | -- नाम -के एल झा ,स्टेट बैंक मेरठ, आई एफ एस सी कोड-SBIN0002321,A/c- -2000 5973259 पर हमें प्राप्त हो सकता है । आप हमें गूगल पे, पे फ़ोन ,भीम पे,पेटीएम पर भी धन भेज सकते हैं - 9897701636 इस नंबर पर |-- ॐ आपका - ज्योतिषी झा मेरठ, झंझारपुर और मुम्बई----ज्योतिष और कर्मकांड की अनन्त बातों को पढ़ने हेतु या सुनने के लिए प्रस्तुत लिंक पर पधारें -https://www.facebook.com/Astrologerjhameerut
रविवार, 15 दिसंबर 2024
मेरी आत्मकथा पढ़ें भाग -104 - खगोलशास्त्री ज्योतिषी झा मेरठ
आज मैं अपनी आत्मकथा में शनि की महादशा का प्रभाव पर कुछ कहना चाहता हूँ | --अस्तु -हर व्यक्ति की कुण्डली समस्त बातों को दर्शाती है --मेरी कुण्डली भी जीवन +मृत्यु को दर्शाती है | मेरी जन्मकुण्डली के अनुसार 2014 से शनि की दशा प्रारम्भ हुई जो 2033 तक चलेगी | शनि मेरी कुण्डली में भाग्य के क्षेत्र में नीच है अतः नीचता से मेरा भाग्योदय होगा --यह बात सौ प्रतिशत सही है | मुझे जीवन में बहुत कुछ मिला पर जिस योग्य था या हूँ उस अनुपात में नहीं मिला | पिता की जगह गैर व्यक्ति पिता की तरह स्नेह तो दिया ही पुत्र की तरह उठाया और बढ़ाया भी | मुझे सहोदर मामा ने कुछ नहीं दिया --गैर व्यक्ति मामा बनकर आगे बढ़ाया | अपने जीजा ने कुछ नहीं दिया --गैर जीजा ने आगे बढ़ाया | अपनी माँ की वात्सलयता या छाया नहीं मिली --सास से दोनों चीजें मिली | अपने सहोदर दीदी हो या अनुज इन दोनों ने मान नहीं बढ़ाया बल्कि गैर व्यक्ति कोई भाई का धर्म निभाया तो कोई दीदी का धर्म निभाया | --मेरा व्यक्तिगत स्वभाव रहा अगर किसी को प्रेम नहीं दिया तो दुःख देने का भी प्रयास नहीं किया | हमने सभी सगे -सम्बन्धियों से भले ही रिश्ते नाते नहीं रखे हों पर कुछ न कुछ दिया और दूर होकर जीने का प्रयास किया | मेरे पिता की कुण्डली में भी नीच का शनि संतान क्षेत्र में था --मेरा भाग्य और पिता से सम्बन्ध बहुत ही गड़बड़ रहा | जबकि पिता और मेरा - दोनों के स्वभाव चाहे समाज हो या व्यक्तिगत जीवन उत्तम और संतोषजनक रहा , पिता परोपकारी थे ,बलशाली थे ,कर्मठ थे ,धार्मिक थे ,सदा मस्त रहते थे -जो था बहुत था यही सोच थी --अपने कार्य में लगे रहते थे | ये तमाम गुण मुझमें भी थे पर --पिता अनपढ़ थे तो मैं विद्वान था ,पिता बहुत ही बलवान थे मैं अति निर्बल था | पिता सदा बल से मुझे जीतने का प्रयास करते थे और मैं सदा बुद्धि से समझाने का प्रयास करता था --पर न मैं पिता को समझा पाया न ही पिता मुझे जीत पाये --परिणाम यह हुआ दोनों के रास्ते अलग -अलग गए | पर न तो पिता मेरे बिना जी पाए और न ही पिता के बिना मैं जी पाया | पिता के पास सबकुछ था --केवल मैं नहीं था --और वो ईश्वर के समीप रहने लगे -जब भी मेरी याद आती थी तो मूर्छित हो जाते थे --यह वेदना ऐसी थी -सांसे तो थी चैन नहीं था | ऐसी स्थिति में केवल मुझे अपने समीप चाहते थे --जो संभव नहीं था | मेरे साथ भी ऐसा ही था --सबकुछ था पर पिता नहीं थे तो अपने आप को अधूरा समझता था | ऐसा लगता था मेरी शान ,मेरी पहचान तो पिता से है --जब पिता नहीं तो संसार के तमाम वैभव किस काम के | मेरे पिता चल बसे -2018 में | पिता के जाने के बाद मैं भी मूर्छित हो गया | ऐसा लगा मेरी वजह से पिता चल बसे --धिक्कार है मुझे अब जीवन जीने और विलाप करने का मेरा कोई अधिकार नहीं है | यह बात न तो पतनी से कह सकता था न ही परजनों को -अंत में मैं भी प्रभु की शरण में रहने लगा | जीने की लालसा खत्म हो गयी -फिर न मेरे पास साज रहे न आवाज , कलम में लिखने की ताकत नहीं रही ,पिता के साथ मानों मेरा तेज समाप्त हो गया | जब मेरे साथ ऐसा होने लगा तो मुझे आभास हुआ मेरे पिता के साथ भी ऐसा ही होने लगा होगा --वो भी माँ से या परिजनों से यह बात नहीं कह पाये होंगें | मेरे पिता सबके साथ होते हुए भी अकेलापन महसूस करते थे इसलिए सदा एकान्त में रहते थे | मैं भी सबके साथ रहता हुआ भी सदा अकेला अपने को पाया है | --मुझे कईबार अहसास हुआ मेरे जीवन का अनमोल रतन मेरे पिता थे -जिनके बिना मैं शून्य हूँ - तो मेरे पिता को भी यही अहसास हुआ होगा | --वैसे मैं ज्योतिषी इसलिए बना था -क्योंकि मेरा अनुज सर्प दंश से मरा था --यह बात मुझे इतनी लगी कि अनन्त ग्रन्थों में यही मृत्यु योग को ढूंढने में जीवन निकल गया --जब होश आया तब पता चला कुण्डली में तो बहुत सी बातें होती हैं जिनपर हमारी नजर नहीं पड़ी | अब एक सक्षम ज्योतिषी होने पर मेरा ध्येय यह है --कोई भी व्यक्ति अपनी कुण्डली का सही आकलन करें और उस पथ पर चले --जिससे उसको सही दिशा मिले ,सही प्रकाश मिले --वो भटके नहीं वो अनन्त बाधाओं का सामना -यत्न और प्रयत्न से करें | -आगे की चर्चा अगले भाग में पढ़ें --भवदीय निवेदक खगोलशास्त्री झा मेरठ --जीवनी की तमाम बातों को पढ़ने हेतु इस ब्लॉकपोस्ट पर पधारें ---khagolshastri.blogspot.com
आत्मकथा क्यों लिखी या बोली सुनें -ज्योतिषी झा मेरठ
दोस्तों आत्मकथा एक सोपान हैं | प्रथम सोपान एक से तैतीस भाग तक ,दूसरा सोपान तैतीस भाग से बानवें भाग तक और अन्तिम सोपान बानवें भाग से अन्त तक -इसके बारे में कुछ कहना चाहता हूँ सुनें --आपकी राशि पर लिखी हुई बातें मिलती है कि नहीं परखकर देखें -
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