दोस्तों -पिता दिवंगत हुए 2018 में --भाई -भाई तो वास्तव में 1998 में ही अलग हो गए थे | हमारी दो बेटियों का बोझ -माता पिता ,परिजनों के साथ -साथ अनुज पर भारी पड़ रहा था | मेरा अनुज गरीब न हो जाय इसलिए मेरे घर में गृह युद्ध शुरू हुआ --फिर भी हम साथ -साथ रहना चाहते थे किन्तु -एक दिन अनुज ने घर से अपमान के साथ स परिवार को निकाल दिया --मुझे कुछ कहता तो मैं सहन कर लेता किन्तु बच्चों का अपमान आज तक मस्तिष्क में जगह बना रखा है | यह जानकारी माता पिता को होने के बाद भी कुछ निर्णय नहीं ले सके जबकि मेरे माता पिता धार्मिक थे | यही अलग होने का कारण था | मेरा भी समय बदला ,मेरा भी राजयोग शुरू हुआ -तो फिर पिता मुझे अलग नहीं होने दिए -- यह गांठ ऐसी थी हम अपने धन को समझने लगे जोड़ने लगे | मैं भी धन की दुनिया में आगे बढ़ता रहा ,अनुज भी बढ़ता रहा --पर विवाद यथावत था --इसका लाभ चाची ने उठाया --24 मुकदमें हुए मुझे छोड़कर | यह कथा मैं सुना चूका हूँ --2018 में पिता दिवंगत हुए -उसके बाद माँ भाई के साथ पहले से ही रहती थी आगे भी रहने लगी | मेरी शर्त थी खाओं पीओ भजन करो --किसी के पास बिना काम मत जाओ --यह माँ को मंजूर नहीं था --जब माँ घर्म पथ पर नहीं चल सकती है तो फिर -ठीक से अलग रहना ही हम उचित समझे | हम दोनों भाई के बटबारे में सबसे बड़ी बाधा --भवन का मुख्य दरवाजा था --बिना दीवाल हुए हम दोनों अलग नहीं हो सकते थे --क्योंकि मार्ग शंकरा था --आने- जाने का रास्ता मेरे हिस्से में था ,सीढ़ी अनुज के हिस्से में थी | एक निर्णय से यह काम हो सकता था -माँ यह कह दे -दोनों भाई अपने -अपने हिस्से बराबर ले लों --इसके बदले -मामा ,दीदी ,जीजा सबने माँ को गलत सलाह दी --हिस्सा मत होने दो तुम कहीं की नहीं रहोगी --माँ ने यही किया ,जबकि सारा समाज कहता था दोनों को बराबर बाँट लेने दो | लड़ाई बहुत बढ़ गयी --अनुज ने हमारी पतनी को गाली -गलौज तो बहुत छोटी बात थी मेरे सामने बहुत अपमान किया --मेरा चुप रहने का एक कारण यह था --मैं शास्त्री था ,शिक्षाविद था ,पिता के बाद बड़े पुत्र को भी पिता का धर्म निभाना चाहिए --इसका परिणाम यह हुआ न तो पतनी का हो सका न ही अनुज का हो सका | मेरी पतनी का कुछ योगदान था --जो मैं दर्शाना चाहता हूँ --जब माता पिता ,अनुज ,अनुज वधु को जेल हुयी थी साथ ही मुकदमें 24 चल रहे थे तो --मेरी पतनी ने ही मुक्ति दिलाई थी --चाची के पैर पकड़कर | आज जिस भवन के शान से अनुज रह रहा है, माता पिता रहे --वो योगदान भी मेरी पतनी का ही था --बदले में --यह पुरस्कार अनुज ने दिया | कर्य में डूबा था परिवार तो मंगलसूत्र बेचकर गरीबी से पतनी ने ही मुक्त करायी थी --इसका ईनाम भी यही मिला | जब भवन बन रहा था तो सिर पर ईंट उठायी थी -मेरी पतनी ने ,जबकि -अनुज ने एक भी ईंट नहीं उठायी | हम दोनों भाई तो अलग थे ही किन्तु --अनुज वधु एवं उसकी पुत्री को स्वर्ण के गहने परिवार में किसी ने नहीं दिए --मेरी पतनी ने ही दिए थे --इन तमाम कार्यों के पुरस्कार अनुज ने अपशब्दों से दिए | --अब मेरे जीवन की आत्मकथा में जो सार है --जिससे आपको जीने की राह मिलती है या आपको इसी प्रकार से जीना चाहिए क्रम से पढ़ते रहें --भवदीय ज्योतिषी झा मेरठ -जीवनी के सभी भागों को पढ़ने के लिए लिंक का उपयोग करें --https://www.facebook.com/Astrologerjhameerut
ऑनलाइन ज्योतिष सेवा होने से तत्काल सेवा मिलेगी -ज्योतिषी झा मेरठ
ऑनलाइन ज्योतिष सेवा होने से तत्काल सेवा मिलेगी -ज्योतिषी झा मेरठ 1 -कुण्डली मिलान का शुल्क 2200 सौ रूपये हैं | 2--हमसे बातचीत [परामर्श ] शुल्क है पांच सौ रूपये हैं | 3 -जन्म कुण्डली की जानकारी मौखिक और लिखित लेना चाहते हैं -तो शुल्क एग्ग्यारह सौ रूपये हैं | 4 -सम्पूर्ण जीवन का फलादेश लिखित चाहते हैं तो यह आपके घर तक पंहुचेगा शुल्क 11000 हैं | 5 -विदेशों में रहने वाले व्यक्ति ज्योतिष की किसी भी प्रकार की जानकारी करना चाहेगें तो शुल्क-2200 सौ हैं |, --6--- आजीवन सदसयता शुल्क -एक लाख रूपये | -- नाम -के एल झा ,स्टेट बैंक मेरठ, आई एफ एस सी कोड-SBIN0002321,A/c- -2000 5973259 पर हमें प्राप्त हो सकता है । आप हमें गूगल पे, पे फ़ोन ,भीम पे,पेटीएम पर भी धन भेज सकते हैं - 9897701636 इस नंबर पर |-- ॐ आपका - ज्योतिषी झा मेरठ, झंझारपुर और मुम्बई----ज्योतिष और कर्मकांड की अनन्त बातों को पढ़ने हेतु या सुनने के लिए प्रस्तुत लिंक पर पधारें -https://www.facebook.com/Astrologerjhameerut
बुधवार, 3 जनवरी 2024
आज मैं अपनी दारुण कथा का प्रसंग सुनाना चाहता हूँ -पढ़ें भाग -92 ज्योतिषी झा मेरठ
दोस्तों -पिता दिवंगत हुए 2018 में --भाई -भाई तो वास्तव में 1998 में ही अलग हो गए थे | हमारी दो बेटियों का बोझ -माता पिता ,परिजनों के साथ -साथ अनुज पर भारी पड़ रहा था | मेरा अनुज गरीब न हो जाय इसलिए मेरे घर में गृह युद्ध शुरू हुआ --फिर भी हम साथ -साथ रहना चाहते थे किन्तु -एक दिन अनुज ने घर से अपमान के साथ स परिवार को निकाल दिया --मुझे कुछ कहता तो मैं सहन कर लेता किन्तु बच्चों का अपमान आज तक मस्तिष्क में जगह बना रखा है | यह जानकारी माता पिता को होने के बाद भी कुछ निर्णय नहीं ले सके जबकि मेरे माता पिता धार्मिक थे | यही अलग होने का कारण था | मेरा भी समय बदला ,मेरा भी राजयोग शुरू हुआ -तो फिर पिता मुझे अलग नहीं होने दिए -- यह गांठ ऐसी थी हम अपने धन को समझने लगे जोड़ने लगे | मैं भी धन की दुनिया में आगे बढ़ता रहा ,अनुज भी बढ़ता रहा --पर विवाद यथावत था --इसका लाभ चाची ने उठाया --24 मुकदमें हुए मुझे छोड़कर | यह कथा मैं सुना चूका हूँ --2018 में पिता दिवंगत हुए -उसके बाद माँ भाई के साथ पहले से ही रहती थी आगे भी रहने लगी | मेरी शर्त थी खाओं पीओ भजन करो --किसी के पास बिना काम मत जाओ --यह माँ को मंजूर नहीं था --जब माँ घर्म पथ पर नहीं चल सकती है तो फिर -ठीक से अलग रहना ही हम उचित समझे | हम दोनों भाई के बटबारे में सबसे बड़ी बाधा --भवन का मुख्य दरवाजा था --बिना दीवाल हुए हम दोनों अलग नहीं हो सकते थे --क्योंकि मार्ग शंकरा था --आने- जाने का रास्ता मेरे हिस्से में था ,सीढ़ी अनुज के हिस्से में थी | एक निर्णय से यह काम हो सकता था -माँ यह कह दे -दोनों भाई अपने -अपने हिस्से बराबर ले लों --इसके बदले -मामा ,दीदी ,जीजा सबने माँ को गलत सलाह दी --हिस्सा मत होने दो तुम कहीं की नहीं रहोगी --माँ ने यही किया ,जबकि सारा समाज कहता था दोनों को बराबर बाँट लेने दो | लड़ाई बहुत बढ़ गयी --अनुज ने हमारी पतनी को गाली -गलौज तो बहुत छोटी बात थी मेरे सामने बहुत अपमान किया --मेरा चुप रहने का एक कारण यह था --मैं शास्त्री था ,शिक्षाविद था ,पिता के बाद बड़े पुत्र को भी पिता का धर्म निभाना चाहिए --इसका परिणाम यह हुआ न तो पतनी का हो सका न ही अनुज का हो सका | मेरी पतनी का कुछ योगदान था --जो मैं दर्शाना चाहता हूँ --जब माता पिता ,अनुज ,अनुज वधु को जेल हुयी थी साथ ही मुकदमें 24 चल रहे थे तो --मेरी पतनी ने ही मुक्ति दिलाई थी --चाची के पैर पकड़कर | आज जिस भवन के शान से अनुज रह रहा है, माता पिता रहे --वो योगदान भी मेरी पतनी का ही था --बदले में --यह पुरस्कार अनुज ने दिया | कर्य में डूबा था परिवार तो मंगलसूत्र बेचकर गरीबी से पतनी ने ही मुक्त करायी थी --इसका ईनाम भी यही मिला | जब भवन बन रहा था तो सिर पर ईंट उठायी थी -मेरी पतनी ने ,जबकि -अनुज ने एक भी ईंट नहीं उठायी | हम दोनों भाई तो अलग थे ही किन्तु --अनुज वधु एवं उसकी पुत्री को स्वर्ण के गहने परिवार में किसी ने नहीं दिए --मेरी पतनी ने ही दिए थे --इन तमाम कार्यों के पुरस्कार अनुज ने अपशब्दों से दिए | --अब मेरे जीवन की आत्मकथा में जो सार है --जिससे आपको जीने की राह मिलती है या आपको इसी प्रकार से जीना चाहिए क्रम से पढ़ते रहें --भवदीय ज्योतिषी झा मेरठ -जीवनी के सभी भागों को पढ़ने के लिए लिंक का उपयोग करें --https://www.facebook.com/Astrologerjhameerut
आत्मकथा क्यों लिखी या बोली सुनें -ज्योतिषी झा मेरठ
दोस्तों आत्मकथा एक सोपान हैं | प्रथम सोपान एक से तैतीस भाग तक ,दूसरा सोपान तैतीस भाग से बानवें भाग तक और अन्तिम सोपान बानवें भाग से अन्त तक -इसके बारे में कुछ कहना चाहता हूँ सुनें --आपकी राशि पर लिखी हुई बातें मिलती है कि नहीं परखकर देखें -
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खगोलशास्त्री ज्योतिषी झा मेरठ
01 /06 /26 से -15 /06 /26 तक की भविष्यवाणी पढ़ें -खगोलशास्त्री झा मेरठ
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